देहरादून
उत्तराखंड में कुल 13 झीलें चिन्हित की गई हैं, जिनमें से 5 झीलें अत्यधिक खतरनाक (पोटेंशियल डेंजरस) श्रेणी में पाई गई–डॉ पंकज चौहान वैज्ञानिक वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालय जियोलॉजी देहरादून।
सचिन कुमार।
-देहरादून के वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालय जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान ने उत्तराखंड में पिघलते ग्लेशियरों और उनसे पैदा होने वाले खतरों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने बताया कि उनका संस्थान गढ़वाल, कुमाऊं और लद्दाख क्षेत्रों में ग्लेशियरों पर लगातार अध्ययन कर रहा है। पिण्डारी (कुमाऊं में), चौराबाड़ी, डोकरानी (गढ़वाल में) और लद्दाख क्षेत्र के कई ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक काम जारी है।
पिछले 15-20 वर्षों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कुमाऊं और गढ़वाल के ग्लेशियर बहुत तेजी से पीछे हट रहे हैं और पिघल रहे हैं। इस तीव्र पिघलाव के कारण ग्लेशियर झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। जब ग्लेशियर आगे की तरफ पिघलता है, तो मोरेन (मलबा) के कारण वहां ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो जाता है। भविष्य में यदि ये झीलें फटती हैं, तो नीचे की ओर बहने वाली नदियों पर इसका भारी और विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है।
एनडीएमए (NDMA) और यूएसडीएमए (USDMA) के माध्यम से किए गए आकलन में उत्तराखंड में कुल 13 झीलें चिन्हित की गई हैं, जिनमें से 5 झीलें अत्यधिक खतरनाक (पोटेंशियल डेंजरस) श्रेणी में पाई गई हैं। इनमें मवांग, केदारताल और कुछ अन्य झीलें शामिल हैं। इन संवेदनशील झीलों पर नजर रखने और किसी भी आपदा से पहले चेतावनी देने के लिए वाडिया संस्थान द्वारा पिछले साल से एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (निगरानी प्रणाली) और देखरेख का कार्य शुरू किया गया है।
-डॉ पंकज चौहान वैज्ञानिक वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालय जियोलॉजी देहरादून।